हिंदू अवधारणा
कर्मKarma
karma — कर्म, और यह नियम कि हर कर्म का फल अवश्य मिलता है
In short
कर्म (Karma) का अर्थ है क्रिया, और यह सिद्धांत कि प्रत्येक कर्म का परिणाम होता है — नैतिक रूप से और जन्म-जन्मांतर तक। शुभ और अशुभ कर्म व्यक्ति के भविष्य और पुनर्जन्म को आकार देते हैं। भगवद्गीता का कर्मयोग सिखाता है कि कर्म करते हुए भी उसके फल की आसक्ति छोड़ दें।
समीक्षित — गोडिफाई टीम · अंतिम अपडेट: अक्टूबर 2026
इसका अर्थ
सरल अर्थ में 'कर्म' यानी क्रिया — पर सिद्धांत रूप में यह कारण और परिणाम का नैतिक नियम है: हमारे भाव और कर्म छाप छोड़ते हैं जो आगे चलकर फल देते हैं, इस जीवन में और संसार के जन्म-चक्र में भी। यह बाहर से थोपा गया भाग्य नहीं, बल्कि हमारे अपने चुनावों का स्वाभाविक फल है।
भगवद्गीता कर्म को एक आध्यात्मिक मार्ग बना देती है। कर्म छोड़ने के बजाय श्रीकृष्ण कर्मयोग सिखाते हैं — अपने कर्तव्य को पूरे मन से करो, पर किसी विशेष फल की लालसा छोड़ दो। अनासक्त होकर कर्म करना ही संसार में रहते हुए भी उससे न बँधने का उपाय है।
कर्म पर एक श्लोक
“karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣu kadācana”
Bhagavad Gita 2.47 · Chapter 2, Sankhya Yoga
तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। फल की इच्छा तेरे कर्म का कारण न बने, और न ही आसक्ति तुझे अकर्म की ओर खींचे।
और श्लोक देखें (Gita Wisdom)कर्म से जुड़े देवता
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कर्म — प्रश्न और उत्तर
कर्म का अर्थ क्या है? (Karma ka matlab)
कर्म का अर्थ है क्रिया, और यह नियम कि हर कर्म का फल मिलता है। शुभ-अशुभ कर्म हमारे भविष्य और पुनर्जन्म को आकार देते हैं — भाग्य के रूप में नहीं, बल्कि अपने ही चुनावों के स्वाभाविक परिणाम के रूप में।
कर्मयोग क्या है?
कर्मयोग भगवद्गीता में बताया गया निष्काम कर्म का मार्ग है: अपने कर्तव्य को पूरे मन से करना, पर फल की आसक्ति छोड़ देना। यही संसार में रहते हुए उससे न बँधने का उपाय है।
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