हिंदू अवधारणा
संसारSamsara
saṃsāra — जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र
In short
संसार (Samsara) जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का वह निरंतर चक्र है जिससे आत्मा कर्म के वश में गुज़रती है। इच्छा और अज्ञान से बँधे प्राणी बार-बार जन्म लेते हैं। इस चक्र से मुक्ति — मोक्ष — ही हिंदू आध्यात्मिक जीवन का परम लक्ष्य है।
समीक्षित — गोडिफाई टीम · अंतिम अपडेट: अक्टूबर 2026
इसका अर्थ
संसार का अर्थ है 'भटकना' — जीवनों का वह क्रम जिसमें आत्मा शरीर-दर-शरीर धारण करती है, और जिसकी परिस्थितियाँ पूर्व कर्मों से आकार पाती हैं। यह अस्तित्व को एक जीवन के बजाय विशाल और आवर्ती रूप में देखने की दृष्टि है, और स्व को किसी एक जीवन से कहीं पुराना और गहरा मानती है।
भगवद्गीता इस यात्रा का कोमल चित्र देती है: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए पहनता है, वैसे ही देहधारी आत्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नए धारण करती है। संसार का चक्र डराने के लिए नहीं, बल्कि अपने से परे — उस मुक्ति (मोक्ष) की ओर संकेत करने के लिए है जो इस चक्र को समाप्त करती है।
संसार पर एक श्लोक
“vāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro 'parāṇi”
Bhagavad Gita 2.22 · Chapter 2, Sankhya Yoga
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीर धारण करती है।
और श्लोक देखें (Gita Wisdom)संबंधित अवधारणाएँ
और अवधारणाएँ
संसार — प्रश्न और उत्तर
संसार क्या है? (Samsara meaning)
संसार जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का वह चक्र है जिससे आत्मा कर्म के वश में गुज़रती है। प्राणी तब तक बार-बार जन्म लेते हैं जब तक वे इस चक्र से मुक्ति (मोक्ष) नहीं पा लेते।
संसार से मुक्ति कैसे मिलती है?
मोक्ष के द्वारा — जो आत्म-ज्ञान, भक्ति या निष्काम कर्म से प्राप्त होता है। अपने सच्चे, अमर स्व की पहचान आत्मा को जन्म-चक्र से मुक्त कर देती है।
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