हिंदू अवधारणा
ब्रह्मBrahman
brahman — परम सत्ता — जो सब कुछ का आधार है
In short
ब्रह्म (Brahman) हिंदू चिंतन में परम, अनंत सत्ता है — वह अपरिवर्तनशील आधार जिससे सब उत्पन्न होता है, जिसमें स्थित रहता है, और जिसमें लौट जाता है। निराकार और वर्णन से परे, इसे शुद्ध सत्-चित्-आनंद के रूप में अनुभव किया जाता है, और भीतर अपने सच्चे स्व के रूप में जाना जाता है।
समीक्षित — गोडिफाई टीम · अंतिम अपडेट: अक्टूबर 2026
इसका अर्थ
ब्रह्म देवताओं में कोई एक देव नहीं, बल्कि स्वयं परम सत्य है — हर वस्तु का स्रोत और सार, नाम-रूप से परे, फिर भी उस जगत् से अलग नहीं जिसमें यह व्याप्त है। उपनिषद इसकी ओर अक्सर निषेध से संकेत करते हैं — 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) — क्योंकि यह मन की हर श्रेणी से परे है।
उपनिषदों की निर्णायक शिक्षा यह है कि यह परम सत्ता दूर नहीं: भीतर का आत्मा मूलतः ब्रह्म ही है। 'तत् त्वम् असि' — 'वह तू ही है' — यह घोषित करता है कि समस्त सत्ता का आधार आपका ही गहनतम स्वरूप है, और इसका साक्षात्कार ही मुक्ति का मर्म है।
ब्रह्म पर एक श्लोक
“tat tvam asi”
Chandogya Upanishad 6.8.7 · Sama Veda
तत् त्वम् असि — 'वह तू ही है'। जो अनंत दिव्य सत्ता सब में व्याप्त है, वही तेरा अपना सच्चा स्वरूप है।
और श्लोक देखें (Gita Wisdom)संबंधित अवधारणाएँ
और अवधारणाएँ
ब्रह्म — प्रश्न और उत्तर
ब्रह्म क्या है? (Brahman meaning)
ब्रह्म परम, अनंत सत्ता है — वह अपरिवर्तनशील आधार जिससे सब कुछ उत्पन्न होकर उसी में लौट जाता है। निराकार और वर्णन से परे, इसे शुद्ध सत्-चित्-आनंद के रूप में अनुभव किया जाता है।
क्या ब्रह्म और ब्रह्मा एक ही हैं?
नहीं। ब्रह्म निराकार परम सत्ता है; ब्रह्मा त्रिमूर्ति के सृष्टिकर्ता देव हैं। एक समस्त सत्ता का आधार है, दूसरा एक व्यक्ति-रूप देवता।
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