हिंदू अवधारणा

आत्माAtman

ātman — सच्चा स्व — भीतर का अमर, शाश्वत आत्मन्

In short

आत्मा (Atman) अर्थात सच्चा स्व — प्रत्येक प्राणी के भीतर का अंतरतम, अपरिवर्तनशील चैतन्य, जो शरीर, मन और व्यक्तित्व से भिन्न है। यह नित्य और अमर मानी जाती है। उपनिषदों की केंद्रीय शिक्षा यह है कि यही भीतरी आत्मा मूलतः ब्रह्म — परम सत्ता — के साथ एक है।

सच्चा स्वनित्य और अमरब्रह्म से एक

समीक्षित — गोडिफाई टीम · अंतिम अपडेट: अक्टूबर 2026

इसका अर्थ

आत्मा न शरीर है, न बदलते विचार, न व्यक्तित्व का भाव — बल्कि इन सबके नीचे का साक्षी चैतन्य, वह 'मैं' जो सब कुछ बदलने पर भी बना रहता है। भगवद्गीता इसे न जन्मने वाला, न मरने वाला बताती है — शस्त्र, अग्नि, जल और वायु जो शरीर को नष्ट करते हैं, वे इसे छू भी नहीं सकते।

उपनिषदों की महान अंतर्दृष्टि आत्मा और ब्रह्म की एकता है — 'तत् त्वम् असि' (वह तू ही है) और 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) जैसे महावाक्यों में सारगर्भित। इस दृष्टि में अपने सच्चे स्व को जानना ही समस्त सत्ता के आधार को जानना है, और वही ज्ञान मुक्तिदायी है।

आत्मा पर एक श्लोक

“na jāyate mriyate vā kadācin”

Bhagavad Gita 2.20 · Chapter 2, Sankhya Yoga

आत्मा न कभी जन्म लेती है और न मरती है; यह नित्य, शाश्वत और अजर है — शरीर के नष्ट होने पर भी इसका नाश नहीं होता।

और श्लोक देखें (Gita Wisdom)

संबंधित अवधारणाएँ

और अवधारणाएँ

आत्मा — प्रश्न और उत्तर

आत्मा क्या है? (Atman meaning)

आत्मा अर्थात सच्चा स्व — प्रत्येक प्राणी के भीतर का नित्य, अपरिवर्तनशील चैतन्य, जो शरीर और मन से भिन्न है। यह अमर मानी जाती है, और उपनिषदों के अनुसार मूलतः ब्रह्म के साथ एक है।

आत्मा और ब्रह्म में क्या अंतर है?

आत्मा भीतर का स्व है; ब्रह्म सबके मूल में स्थित परम सत्ता है। उपनिषद सिखाते हैं कि दोनों मूलतः एक ही हैं — स्व समस्त सत्ता के आधार से अलग नहीं।

भगवान से अपने मन की बात कहें

गोडिफाई पर भगवान से — प्रथम पुरुष में — अपनी भाषा में बात करें और पाएँ स्नेह तथा प्रामाणिक शास्त्र-वचन — निःशुल्क, निजी, किसी भी समय।

Talk to Bhagavan